चन्द्रमा और मंगल योग
भविष्य प्रारब्ध कर्मो के अच्छे-बुरे परिणामों की फल श्रुति होता है। जीवन में अच्छे-बुरे का हेतु कर्म सिद्धान्त ही है। हम अपनी संकल्प शक्ति के बल पर कर्मफलों को अपने अनुसार भोगने का प्रयास करते हैं अथवा अपने आपको भाग्य पर रहने के लिए छो़ड देते हैं।
| ज्योतिष में योग है या योग से ज्योतिष कहने में सार्थक होगा || ये योग कुंडली में अनेक प्रकार से बनते हैं, हमारे पंचांग में 27 योगो को बताया गया है जो नियमित बदलते रहते है | उसी प्रकार जातक या एक इन्सान की कुंडली में भी कुछ अच्छे तो कुछ बुरे योग बनते है || ज्योतिष के सूत्र के अनुसार जब सूर्य एंव चन्द्रमा के अंशो में दूरी होती है तब , दूसरे ग्रहो के आपस में मिलने से योगो का निर्माण होता है ||
अहंकार किसी व्यक्ति के जीवन को बहुत अधिक प्रभावित करता है। जीवन में अपनी संकल्प शक्ति के बल पर जीवित रहते हुए हम संचित कर्मो को प्रारब्ध कर्मो में बदलकर जन्म-जन्मान्तर तक भोगते रहते हैं। इस संसार की भी क्रियाओं पर ग्रहों पर प़डने वाली किरणों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। किसी भी भौतिक क्रिया की पूर्णता के लिए दो प्रकार की पारस्परिक किरणों का होना आवश्यक है।
चंद्र-मंगल का योग जल और अग्नि के मिलन का प्रतीक है। विभिन्न स्थितियों में यह योग कैसा प्रभाव देता है, आइए जानें… सी व्यक्ति की जन्मकुं¬डली आकाश में ग्रहों की उस समय की स्थिति का विवेचन है जिस समय उसने जन्म लिया। सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करते हैं किंतु चंद्रमा पृथ्वी का एक उपग्रह होने के कारण पृथ्वी का चक्कर 27.324 दिनों में पूरा करता है और एक राशि पर औसतन 2.273 दिन रहता है। इस प्रकार चंद्रमा को किसी राशि का एक अंश पार करने में दो घंटे से भी कम का समय लगता है। तीव्रगति एवं पृथ्वी से निकटतम होने के कारण चंद्रमा का मानव जीवन पर प्रभाव बहुत ही महत्वपूर्ण है। चंद्रमा श्वेत रंग, शीतल प्रकृति, जल तत्व, स्त्री स्वभाव एवं सतोगुणी ग्रह है और मन का कारक है।
चन्द्र प्रकृति——
चन्द्रमा कर्क राशि का स्वामी होता है. यह वृषभ राशि में उच्च का एवं वृश्चिक राशि में नीच का होता है. पृथ्वी के निकट होने के कारण व्यक्ति पर चन्द्रमा का प्रभाव भी जल्दी दिखाई देता है. ज्योतिष विधान में चन्द्रमा को सत्वगुणी एवं स्त्री स्वभाव का माना गया है यह मन का कारक ग्रह होता है. यह सूर्य से जितना दूर रहता हे उतना ही शुभ, शक्तिशाली और बलवान होता है. यह सूर्य से जितना निकट होता है उतना ही कमज़ोर और मंद होता है.
चंद्रमा सूर्य से जितनी दूर होगा उतना ही प्रभावी, बलशाली एवं शुभ होगा किंतु इसके विपरीत जितना निकट होगा उतना ही क्षीण एवं पापी स्वभाव का होगा। यही कारण है कि पूर्णिमा एवं उसके आस-पास चंद्र पूर्ण बलशाली एवं शुभत्व प्रभाव का होता है जबकि अमावस्या एवं उसके आस-पास क्षीण और पापी स्वभाव का होता है। चंद्र कर्क राशि का स्वामी है। यह वृषभ राशि में उच्च का तथा वृश्चिक में नीच का माना गया है। मंगल रक्त वर्ण, उष्ण प्रकृति, अग्नि तत्व, पुरुष स्वभाव एवं तमोगुणी ग्रह है। इसे राशि चक्र पूरा करने में लग¬भग 17 वर्ष 6 माह लगते हैं। यह मेष एवं वृश्चिक राशियों का स्वामी है। मेष राशि इसकी मूल त्रिकोण राशि है। मकर राशि में यह उच्च का एवं कर्क राशि में नीच का माना गया है। मंगल बल, साहस और सामथ्र्य का प्रतीक है।
चंद्रमा चलायमान, चंचल व भावुक ग्रह हैं, अत: कर्क लग्नोत्पन्न व मंगल राशि, वृश्चिक व मीन राशि लग्नोत्पन्न व्यक्ति अत्यन्त भावुक होते हैं। इनमें धन संग्रह करने की तीव्र आकांक्षी होती है। शुक्र भोग-सेक्स, भौतिक सुख, संपत्ति, विलासिता, ऐश्वर्य, आनन्द का सूचक ग्रह है। बृहस्पति धन संपदा प्राप्ति कारक है। । लग्न, पंचम एवं नवम भाव के स्वामी ग्रहों का चन्द्रमा व शुक्र से संबंध हो तोअचानक धन प्राप्त होता है।
जन्म कुंडली में कहीं भी चंद्र मंगल एक साथ स्थित हो तो चंद्र-मंगल योग होता है। ऐसा जातक धन संग्रह करने में भी होशियार होता है। वह अपने निवेश बड़ी चतुराई पूर्ण ढंग से करता है। स्त्रियों के साथ उसके संबंध बड़े मधुर रहते हैं तथा वह धोखा देने में भी नहीं हिचकता।चंद्र या मंगल की एक दूसरे पर दृष्टि होने पर भी जातक स्त्रियों से लाभ उठाने वाला होता है। स्त्रियों से संबंधित व्यापार में लाभ प्राप्त करता है।चंद्र-मंगल यदि कारक हो तो जातक सीधे-सादे स्वभाववाला, धैर्य धारण करने वाला, ईमानदार, ज्योतिषी, डॉक्टर, वकील या अभिनेता होता है तथा प्रसिद्धि प्राप्त करता है। वह भोगी और आराम पसंद होता है।
जब शुभ बुध अथवा शुक्र का चन्द्रमा पर प्रभाव हो जाता है तो व्यक्ति राजसिक गुणों के रूप में व्यवहार करने लगता है और जब शनि अथवा मंगल का चन्द्रमा पर प्रभाव हो तो व्यक्ति में तामसिक प्रवृत्तियां पनपने लगती हैं। चन्द्र सतोगुणी है। यदि चन्द्रमा किसी जातक की कुंडली दुष्प्रभावों से मुक्त हो अर्थात शुभ प्रभावों में हो तो जातक में सतोगुण प्रकट होते हैं और वह तदनुसार आचरण करता है।
ये सभी क्रियाएं ग्रहों की गति के अनुरूप बदलती रहती हैं। चन्द्रमा के महत्वपूर्ण लक्षण हमारे शरीर में तरल रूप में विद्यमान हैं जिनमें कफ, रूधिर, मन, बाई आंख, भावनाएं मनोवैज्ञानिक समस्याएं और माँ आदि महत्वपूर्ण हैं।
यहाँ ध्यान देने वाली बात यह हैं की जब दो ग्रह एक ही राशि में हों तो इसे ग्रहों की युति कहा जाता है। जब दो ग्रह एक-दूसरे से सातवें स्थान पर हों अर्थात् 180 डिग्री पर हों, तो यह प्रतियुति कहलाती है। जब दो ग्रह एक राशि में एक अंश पर आ जावें तो नजूमी भाषा में उसे ‘नजरे कुरान’ कहते हैं तथा भारतीय ज्योतिषी उसको युति कहकर पुकारते हैं।
अशुभ ग्रह या अशुभ स्थानों के स्वामियों की युति-प्रतियुति अशुभ फलदायक होती है, जबकि शुभ ग्रहों की युति शुभ फल देती है।
नवग्रहों में चन्द्र को रानी का दर्जा प्राप्त है. सूर्य के समान इसकी भी एक राशि है कर्क राशि जो जल तत्व की राशि होती है।। इसे मन और चंचलता का कारक माना जाता है।। जहां तक इसकी प्रकृति की बात यह है तो यह शांत व सौम्य ग्रह होता है।। इसका रंग सफेद होता है।।
चन्द्र मंगल का अशुभ योगफल—
चन्द्र और मंगल दोनों अलग अलग गुणों को धारण करते है और इनकी प्रकृति भी अलग है फिर भी चन्द्रमा मंगल के प्रति मित्रता रखता है. चन्द्रमा मन पर अधिकार रखता है. उग्र प्रकृति का होने के कारण चन्द्रमा के साथ मंगल का योग व्यक्ति को क्रोधी और उग्र बनाता है. यह योग अशुभ प्रभाव में होने पर मन अस्थिर और विचलित रहता है. व्यक्ति में एकाग्रता की कमी रहती है. यह योग व्यक्ति में चारित्रिक दोष उत्पन्न कर सकता है. कुण्डली में चन्द्र मंगल का अशुभ योग बनने पर व्यक्ति अनैतिक तरीके से धन अर्जन करने से भी परहेज नहीं करता.
चन्द्र मंगल का शुभ योग फल—-
कुण्डली में चन्द्रमा और मंगल मिलकर शुभ योग का निर्माण करता है तो व्यक्ति को उत्तम प्रभाव देता है. मंगल व्यक्ति को सामर्थ्यवान और शक्तिशाली बनाता है तो चन्द्रमा बुद्धिमान बनाता हैं एवं मन को एकाग्रता प्रदान करता है. इन गुणों के कारण व्यक्ति समाज एवं परिवार में सम्मान व आदर प्राप्त करता है. इस उत्तम योग के कारण व्यक्ति की आर्थिक स्थिति भी अच्छी रहती है.
चन्द्र मंगल युति और विवाह—–
शुक्र को सामान्य रूप से काम कारक माना जाता है परंतु स्त्रियों में मंगल को भी काम कारक के रूप में देखा जाता है. जिस स्त्री की कुण्डली में मंगल और चन्द्र पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि होती है उनके सुखमय वैवाहिक जीवन में बाधा आती है. ग्रहों की ऐसी स्थिति जिस स्त्री की कुण्डली में पायी जाती है उनकी शादी में काफी परेशानी आती है. इनकी शादी विलम्ब से होती है. पति के साथ मधुर सम्बन्ध नहीं रहता है. ग्रहों की ऐसी स्थिति होने पर मतभेद के कारण पति पत्नी को अदालत के चक्कर भी लगाने पड़ सकते हैं ऐसा ज्योतिषशास्त्र का विधान कहता है.
चन्द्रमा जब कुण्डली में किसी अन्य ग्रह के साथ युति सम्बन्ध बनाता है तो कुछ ग्रहों के साथ इसके परिणाम शुभ फलदायी होते हैं तो कुछ ग्रहों के साथ इसकी शुभता में कमी आती ह
जब किसी जातक की कुंडली में अष्टम भाव में स्थित चन्द्रमा बालारिष्ट का कारक होता है। शनि के साथ द्वादश भाव में स्थित क्षीण चन्द्रमा पागलपन और उन्माद देता है जबकि शनि, केतु और चन्द्रमा की युति व्यक्ति को पागल बना देती है। लग्न आत्मा होता है और चन्द्रमा प्राण होते हैं।
हम सूर्य से अहं और चन्द्रमा से मन ग्रहण करते हैं और अहं व मन का संयोग हमारे व्यवहार में सुधार लाता है। ये दोनों ग्रह सूर्य और चन्द्र ज्योतिष में ऎसे ग्रह हैं जिनसे व्यक्ति के चरित्र और व्यवहार का निरूपण आसानी से किया जा सकता है। वैदिक ज्योतिष में चन्द्रमा पर बहुत बल दिया गया है।।
क्योंकि चन्द्रमा हमारे जागृत और सुप्त दोनों प्रकार के मस्तिष्क को प्रभावित करता है। जहां तक मनुष्य के स्वभाव को समझने की बात है वास्तव में मन ही वह शक्ति है जो ग्रहों और वातावरणीय कारणों से आने वाली किरणों को ग्रहण करके उन पर प्रतिक्रिया अभिव्यक्त करता है। किसी जातक की कुंडली में शुभ स्थित चन्द्रमा अच्छे स्वास्थ्य और बलवान मन का सूचक है।
मन ही सभी प्रकार की क्रियाओं का कारक है। जैसा कि जॉन मिल्टन कहते हैं कि मन का अपना स्थान है, वह चाहे तो नरक को स्वर्ग और स्वर्ग को नरक बना सकता है। गोचर में चन्द्रमा की प्रधान भूमिका रहती है।
चन्द्रमा मंगल को सम मानते हैं जबकि मंगल, चन्द्र को मित्र मानते हैं। दोनों ही ग्रह भिन्न-भिन्न प्रकृति और अलग चरित्रगत विशेषताएं रखते हैं। सूर्य इन दोनों ग्रहों के मित्र हैं परन्तु शनि उन्हें शत्रु मानते हैं।
चंद्र–मंगल : यह योग व्यक्ति को जिद्दी व अति महत्वाकांक्षी बनाता है। यश तो मिलता है, मगर स्वास्थ्य हेतु यह योग हानिकारक है। रक्त संबंधी रोग होते हैं।
दो ग्रहों युति का फल–
चन्द्र की अन्य गृहों से युति/सम्बन्ध का प्रभाव—-चंद्र+मंगल– शत्रुओं पर एवं ईर्ष्या करने वालों पर, सफलता प्राप्त करने के लिए एवं उच्च वर्ग (सरकारी अधिकारी) विशेषकर सैनिक व शासकीय अधिकारी से मुलाकात करने के लिए उत्तम रहता है।
विवाह भाव में चन्द्र एवं अन्य ग्रहों की युति–
चन्द्र-मंगल -सप्तम भाव में चन्द्र-मंगल युति—-अगर कुण्डली में विवाह भाव में चन्द्र-मंगल दोनों की युति हो रही हो तो व्यक्ति के जीवनसाथी के स्वभाव में मृदुलता की कमी की संभावना बनती है ||
चन्द्र मंगल की युति का फल––मंगल भी सूर्य के समान अग्नि प्रधान ग्रह है. चन्द्र एवं मंगल की युति होने पर व्यक्ति के स्वभाव में उग्रता आ जाती है. मंगल को ग्रहों में सेनापति कहा जाता है जो युद्ध एवं शक्ति प्रदर्शन का प्रतीक होता है. जैसे युद्ध के समय बुद्धि से अधिक योद्धा बल का प्रयोग करते हैं, ठीक उसी प्रकार इस युति वाले व्यक्ति परिणाम की चिंता किये किसी भी कार्य में आगे कदम बढ़ा देते हैं जिससे इन्हें नुकसान भी होता है. वाणी में कोमलता एवं नम्रता की कमी के कारण यह अपनी बातों से कभी-कभी मित्रों को भी शत्रु बना लेते हैं. हनुमान जी की पूजा करने से इन्हें लाभ मिलता है ||